छत्तीसगढ़

गांव की गलियों में भी सुरक्षा जरूरी, 77 साल के दादूराम साहू हर सफर में पहनते हैं जिम्मेदारी का हेलमेट..

(दादूराम बने “सेफ्टी गुरु” कहा हेलमेट में सिर ही नही सोंच भी सुरक्षित)

रियाज़ अशरफी|कशिश न्यूज़

सुरक्षा का मतलब सिर्फ ट्रैफिक सिग्नल तक सीमित नहीं है। यह एक सोच है जो अगर किसी की आदत बन जाए तो पूरे समाज को बदल सकता है और ऐसी सोंच के जीते जागते उदाहरण है, सीपत क्षेत्र के ग्राम झलमला निवासी 77 वर्षीय दादूराम साहू उम्र ढल चुकी है, लेकिन जिम्मेदारी सर पर सवार है, जो आज पूरे क्षेत्र में सुरक्षा जागरूकता की एक मिसाल बन चुके हैं। क्योंकि दादू राम आज भी हर सफर में हेलमेट पहनना नहीं भूलते खेत- खलिहान जाना हो या बाजार तक तक का छोटा सफर वह बिना हेलमेट गांव की गलियों में भी बाइक नहीं चलाते। चाहे दूरी कितनी भी कम क्यों न हो।

दादूराम बताते हैं कि उन्होंने 14 साल पहले एक सड़क हादसे को करीब से देखा था, तभी उन्होंने उसी दिन से मन में ठान लिया कि अब बिना हेलमेट वह बाइक नहीं चलाएंगे। उनका मानना है कि हादसा कब, कहां और कैसे हो जाए, यह कोई नहीं जानता लेकिन सावधानी जरूर हमारे हाथ में है।

उनकी इस आदत से अब गांव के अन्य लोग भी प्रेरित हो रहे हैं। कई युवक अब दादूराम को देखकर हेलमेट पहनना शुरू कर चुके हैं। गांव के बुजुर्ग भी कहते हैं कि दादूराम की बातों में वजन है, वो खुद अमल करते हैं, इसलिए उनकी बात असर करती है।

दादूराम का कहना है कि हेलमेट केवल हादसे में सिर की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि जीवनशैली में अनुशासन और जिम्मेदारी का प्रतीक है। वे मुस्कुराते हुए कहते हैं,हेलमेट पहनने से ना सिर्फ हादसों से सिर बचता है बल्कि ठंड, धूल और धूप से भी बचाता है, और सबसे जरूरी बात परिवार को सुकून मिलता है कि उनका अपना सड़क में सुरक्षित है।

आज जब सड़क सुरक्षा को लेकर पुलिस – प्रशासन या संगठन लगातार जागरूकता अभियान चला रहा है, तब दादूराम जैसे आम नागरिकों की सोच वाकई सुरक्षा की असली तस्वीर पेश करती है। जो बिना किसी मंच या नारे के रोज़ एक साकारात्मक संदेश दे रहे है। क्योंकि सड़क सुरक्षा की शुरुआत हेलमेट से नहीं सोच से होती है और यह सोच अगर हर व्यक्ति के सिर पर सवार हो जाए तो शायद हादसे इतिहास बन जाए। हेलमेट पहनना न सिर्फ कानून का पालन है, बल्कि अपने परिवार के प्रति प्यार और जिम्मेदारी का प्रतीक भी।

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