थानेदार का चेहरा बदलने से नहीं सुधरेगा सीपत, बीमारी जड़ में है, जरूरत है पूरी सिस्टम बदलने की!

कहने को थाना प्रभारी बदला गया है, पर सिस्टम वही पुराना
रियाज़ अशरफी|सीपत
न्यायधानी के सीपत थाने की हालिया घटना जहां थाने के शौचालय के गेट पर प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के पोस्टर लगे मिले और इसके बाद सीपत थाना प्रभारी सहित जिले के कई थानेदारों के तबादले हुए। सीपत थाने में यह कोई रातों-रात की चूक नहीं, बल्कि संकेत है उस पुलिसिया प्रणाली का जो लंबे समय से रोगग्रस्त है। स्थानीय गुस्से और राजनीतिक दबाव से दबते हुए सिर्फ थाना प्रभारी को हटा देना समाधान है… सवाल अब भी वही है, क्या सिर्फ थाना प्रभारी बदल देने से थाने की व्यवस्था सुधर जाएगी…? जवाब है…जरूरत है पूरी सिस्टम को बदलने की।
सीपत का मामला किसी “एक दिन की गलती” का परिणाम नहीं, बल्कि उस रोगग्रस्त पुलिसिया प्रणाली का आईना है, जो वर्षों से भ्रष्टाचार और अंदरूनी गुटबाजी में जकड़ी हुई है। इन रोगों का असली जड़ यहां सालों से जमे कुछ आरक्षक, प्रधान आरक्षक और एक व दो स्टारधारी पुलिस कर्मी हैं, जो असली “थाने के मालिक” बने बैठे हैं। आदेश ऊपर से आते हैं, लेकिन अमल वही करते हैं जिनका थाने में वर्षों से “स्थायी डेरा” है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि “थानेदार तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन जो नीचे जमे हैं, वही व्यवस्था चलाते हैं।” यह सिस्टम पूरी तरह से सड़ चुका है, सिर्फ थानेदार के चेहरा बदलने से इसमें कोई सुधार नहीं आने वाला।
थाने में टीआई की नई नियुक्ति जरूर हुई है, और बताया जा रहा है कि नए थाना प्रभारी व्यवहारिक और सुलझे हुए अधिकारी हैं, लेकिन असली चुनौती उनके सामने वही पुराना “थाने का गुटीय नेटवर्क” है। अगर इन जड़ों को वक्त रहते नहीं काटा गया तो महज़ कुछ ही महीनों में हालात फिर वहीं लौट आएंगे.. जहां से इसकी शुरुआत हुई थी।



