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क्या…? सीपत फिर उबाल पर होगा: 16 साल पुरानी भूख, 288 अधपकी उम्मीदें और प्रभावित ग्रामों के अधूरे विकास पर सत्ता की धीमी आंच पर चढ़ती जनक्रांति की हांडी…?

क्या…फिर ‘सुलगने’ लगा है आंदोलन का चूल्हा

रियाज़ अशरफी | कशिश न्यूज़

कभी वादों की रोटियाँ सेंकने वाली सीपत की ज़मीन एक बार फिर से धधकने लगी है। 2008 की चिंगारी जो कभी ‘तंदूरी आंदोलन’ बनकर भड़की थी, अब दोबारा शोले बनकर उठने को तैयार है। इस बार मसाले और भी तीखे हैं ,288 अधूरे वादे, अधकचरा रोजगार, बदहाल गांव और एनटीपीसी की तीसरी यूनिट की गरमाई हुई सियासत।

वादे की थाली ‘गरमागरम’ नहीं, बल्कि जली हुई!

2008 के जनआंदोलन के बाद एनटीपीसी और राज्य सरकार ने एक भव्य समझौता किया था जिसमे 692 प्रभावितों को नौकरी देने का ऐलान के साथ करार हुआ था। पर 16 साल गुजरने के बाद भी सिर्फ 404 लोगों को ही नौकरी का स्वाद चखने मिला। बाकी 288 लोग आज भी वेटिंग लिस्ट में भूखे बैठे हैं,जैसे किसी सरकारी ‘ढाबे’ में “आपका नंबर आएगा” की सूखी परची लेकर इंतज़ार कर रहे हों।

तीसरी यूनिट का धुआँ बहुत है, पर रोटी अब तक नहीं

एनटीपीसी की तीसरी यूनिट अब लगभग पूरी हो चुकी है। साइट पर हलचल है, मशीनें गरज रही हैं, सीटी बज रही है, लेकिन स्थानीयों के हिस्से में सिर्फ़ धुआँ और डस्ट आया है। वादों के मेनू में रोजगार, ठेके और प्रशिक्षण सब मौजूद थे, पर परोसा गया सिर्फ़ इंतजार और निराशा।

सियासी हलचल, कौन पका रहा है ‘सिक्रेट आंदोलन रेसिपी’?

इधर क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि अचानक एक्टिव मोड में आ गए हैं,मीटिंग, फील्ड विज़िट्स, और बंद दरवाज़ों के पीछे होने वाली ‘आग में नमक डालने’ जैसी चर्चाएँ तेज हो रही हैं। सीपत के चूल्हे पर फिर से एक सियासी खिचड़ी पक रही है, लेकिन सवाल ये है: क्या यह 2008 जैसा जनआंदोलन फिर से जन्म लेगा…?

अबकी बार हल्का उबाल नहीं, शायद विस्फोट हो!

अब आंखें टिकी हैं उस पल पर, जब यह ‘गुप्त पकवान’ सामने आएगा। क्या 288 लोगों की बेरोजगारी की चिंगारी एक बार फिर पूरे तंत्र को झुलसा देगी? क्या सीपत फिर से विरोध की राजधानी बनेगा? फिलहाल इतना तय है की सीपत का सामाजिक तापमान उफान पर है। अगर अबकी बार आंदोलन का चूल्हा पूरी तरह सुलगा, तो बात सिर्फ़ रोटी की नहीं रहेगी, इस बार थाली में पूरी व्यवस्था पर सवाल परोसे जाएंगे।

16 साल की भूख, अधूरे वादों की कसैली रोटी और बेक़रार 288 परिवारों की सुलगती उम्मीदें, क्या सीपत की हांडी एक बार फिर उबलने को तैयार है। यह कोई आम आंदोलन नहीं होगा। उम्मीद है कि यह शायद सत्ता की कड़ाही पर चढ़ा सबसे करारा सवाल बनेगा। लेकिन यह सब नेतृत्व पर डिपेंड करेगा।

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