बिलासपुर

प्रभारी चिकित्सा अधिकारी के निधन बाद संविदा डॉक्टर को दी गई जिम्मेदारी…वह भी महीने भर से गायब… अब ग्रामीण चिकित्सा सहायको के भरोसे सीपत का पीएचसी…?

सीपत (रियाज़ अशरफी)। सीपत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्सा व्यवस्था भगवान भरोसे है यहां के प्रभारी चिकित्सा अधिकारी का निधन डेढ़ माह पूर्व हो गया था। इसके बाद से इलाज के नाम से हॉस्पिटल की व्यवस्था चरमरा गई है। रोजाना ओपीडी में सौ के लगभग मरीज पहुंच रहे है। मौसम में तब्दीली की वजह से मरीजों की संख्याओं में और भी इजाफा हो गया है। लेकिन अस्पताल में अनुभवी डॉक्टर के नही होने से ग्रामीण निजी अस्पतालों इलाज कराने मजबूर हो रहे है।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सीपत

बता दें कि सीपत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ राजेन्द्र मरावी का डेढ़ माह पूर्व 5 मार्च को बीमारी के चलते निधन हो गया था। उनकी मृत्यु के बाद शासन से दो वर्ष के लिए संविदा में नियुक्त डॉ आरती भावना सिंह को तत्कालीन व्यवस्था के तहत पीएचसी के प्रभारी चिकित्सा अधिकारी की जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन डॉ भावना इन डेढ़ महीनों में सिर्फ दो से चार दिन के लिए ही अस्पताल आये। वर्तमान में वे नदारत है। बांकी के दिनों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का संचालन ग्रामीण चिकित्सा सहायकों के भरोसे है। शहर से लगे सीपत जैसे साधन संपन्न गांव के स्वास्थ्य व्यवस्था का जब इतना बुरा हाल है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुरस्त ग्रामीण क्षेत्रो का क्या हाल होगा।

डॉक्टर के इंतजार में बैठे मरीज

अंतिम बार 22 दिन पूर्व अस्पताल आये थे डॉ भावना

वैसे तो सीपत पीएचसी में डॉ आरती भावना सिंह की नियुक्ति शासन के आदेश पर 8 माह पूर्व सविंदा डॉक्टर के रूप में हुई थी। लेकिन डॉ राजेन्द्र मरावी के निधन के बाद उन्हें प्रभारी चिकित्सा अधिकारी बनाया गया था। नियुक्ति के बाद उन्हें सिर्फ 2 से 4 दिन ही अस्पताल में देखा गया है। वे अंतिम बार 20 दिन पूर्व 2 अप्रैल को कुछ देर के लिए आये थे । इसके बाद से पता नही है।

जिनको डॉक्टर लिखने का अधिकार नही, वही संभाल रहे है चिकित्सा व्यवस्था

सीपत के सरकारी अस्पताल में एक आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी और दो ग्रामीण चिकित्सा सहायक नियुक्त है। इनमें से दो आरएमएस है जिन्हें डॉक्टर लिखने का अधिकार ही नही है। इन्ही तीनो के रेख-देख में अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था संचालित है। विडंबना यह है कि अक्सर ये तीनो अपने कैबिन से नदारत रहते है। दूर दराज से आये हुए मरीजों को इलाज के अभाव में भटकते देखा जा सकता है।

डॉक्टर का खाली कैबिन

मरीज के अलावा स्टूडेंट और पुलिस भी परेशान

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में रेगुलर चिकित्सा अधिकारी के नहीं होने से कई तरह की परेशानियां लोगो को हो रही है। स्कूली छात्रों को मेडिकल सर्टिफिकेट, आधार कार्ड त्रुटि फार्म में हस्ताक्षर तो पुलिस को एमएलसी, पोस्टमार्टम कराने में कठिनाई हो रही है। बताया जा रहा है की इन डेढ़ माह में लगभग दो सौ से अधिक ऐसे मामले पेंडिंग में है।

पोस्टमार्टम करने बीएमओ को आना पड़ता है

पीएचसी में अनुभवी पुरुष डॉक्टर नहीं होने के कारण शव का पोस्टमार्टम करने के लिए मस्तूरी बीएमओ एनआर कंवर को स्वयं सीपत आना पड़ता है यही कारण है कि मृतक के परिजनों को लंबे समय तक पोस्टमार्टम के लिए इंतजार करना पड़ता है कभी-कभी तो 10-10 घण्टो के बाद पीएम होता है। अगर पुरुष चिकित्सा अधिकारी की नियुक्ति हो जाती तो इन समस्याओं से जूझना नहीं पड़ता।

जिला चिकित्सा अधिकारी अनिल श्रीवास्तव का कहना है कि डॉ भावना के अस्पताल नही आने की जानकारी नही है बहुत ही जल्द इस दिशा में पहल किया जाएगा।

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