भीख माँगती मासूम बनी विद्यार्थीनी, सीपत में नायब तहसीलदार व भाजपा नेताओं की पहल से रिया को मिला शिक्षा का अधिकार…@

कशिश न्यूज | सीपत
फटे कपड़े, बिखरे बाल, हाथों में फटा थैला और नंगे पाँव… धूप की तपिश में एक नन्ही बच्ची भीख माँग रही थी। यह कोई राह चलती अनजान जगह नहीं, बल्कि सरकारी स्कूल का दरवाज़ा था। विडंबना देखिए – जहाँ बच्चे किताबों की दुनिया में भविष्य गढ़ते हैं, वहीं 8 वर्षीय मासूम रिया देवदत्त मजबूरी के कटोरे से जीवन संवारने की कोशिश कर रही थी।

भीड़ में न जाने कितने लोग गुज़रते रहे, पर किसी की नज़र उस बच्ची के दर्द पर नहीं पड़ी। तभी पास की चाय दुकान पर बैठे सीपत के नायब तहसीलदार देश कुमार कुर्रे और भाजपा नेता अभिलेष यादव व मन्नू सिंह ठाकुर ने देखा और एक पल में हालात बदलने का संकल्प लिया।
रिया ने मासूमियत से अभिलेश यादव को बताया मैं छह भाई–बहनों में दूसरे नंबर की हूँ। कभी स्कूल नहीं गई। माँ–पापा और बड़ा भाई कबड्डी चुनते हैं। मैं और मेरे छोटे भाई बहन भीख माँगते है। तभी तो घर का चूल्हा जलता है। उसकी सच्चाई सुनकर सबकी आँखें भर आईं।
लेकिन किस्मत का पन्ना यहीं से पलट गया। नायब तहसीलदार ने तुरंत सौ रुपये देकर चप्पल दिलाई, भाजपा नेता अपनी कार में बैठाकर सीपत के नवाडीह चौक स्थित शासकीय प्राथमिक शाला लेकर आ गए। नायब तहसीलदार के कहने पर स्कूल स्टाफ ने रिया का नाम व पता लिखा साथ ही किताब–कॉपी, पेन और दो नई ड्रेस थमाई। पहली बार अपने लिए नई चीजें पाकर रिया की आँखों में वही चमक लौटी, जो हर बच्चे के चेहरे पर होनी चाहिए। उसने अधिकारी नेता व शिक्षकों के सामने वादा किया की अब मैं भीख नहीं माँगूँगी, रोज स्कूल जाऊँगी।
इसके बाद रिया को तहसील कार्यालय सीपत लाया गया यहां गुरुवार होने के कारण एसडीएम का लिंक कोर्ट चल रहा था। एसडीएम प्रवेश पैकरा को इस पहल की जानकारी दी गई तो उन्होंने तत्काल पंचायत सचिव रेखा पांडेय को आदेश दिए कि परिवार का सर्वे कर राशन कार्ड बनवाया जाए और माता–पिता को रोजगार दिलाने की पहल की जाए। तहसीलदार सोनू अग्रवाल ने कहा मौके पर भेजकर सर्वे कराएंगे और जो उचित होगा जरूर किया जाएगा । वहीं भाजपा नेता अभिलेष यादव और नायब तहसीलदार देश कुमार ने वादा किया कि रिया को निजी ट्यूशन भी दिलाई जाएगी और ऐसे बच्चों को ढूँढकर शिक्षा से जोड़ा जाएगा।
अभिलेष यादव ने कहा की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना है कि देश का कोई बच्चा अशिक्षित न रहे। अब हमारी ज़िम्मेदारी है कि हर गली–मोहल्ले से ऐसे बच्चों को पहचानकर उन्हें स्कूल से जोड़ा जाए। रिया की कहानी यह बताने के लिए काफी है कि गरीबी बच्चों के सपनों की दुश्मन नहीं, बल्कि समाज की आँख खोलने वाली कसौटी है।
आज रिया ने कटोरे से किताब तक का सफर शुरू किया है। सवाल यह है क्या हम सब मिलकर हर ‘रिया’ की ज़िंदगी बदलने का संकल्प ले पाएँगे..?